Saubhagya Muni Was Praised In The Religious Assembly – धर्मसभा में सौभाग्यमुनि का हुआ गुणगान

सौभाग्य मुनि का पुण्यस्मृति दिवस

बेंगलूरु. जयनगर में विराजित साध्वी रिद्धिमा के सान्निध्य में मंगलवार को शेरे मेवाड़ श्रमण संघ के महामंत्री सौभाग्य मुनि के प्रथम पुण्यस्मृति दिवस पर गुणगान सभा का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर साध्वी ने कहा कि अकोला चित्तौडग़ढ़ के पास एक छोटा सा गांव जहां पर नाथूलाल गांधी और नाथदेवी के घर दो बेटे और दो बेटियां हुई। सबसे छोटे बेटे सुजानमल जिनका जन्म 10 दिसंबर 1937 को हुआ था। गुरुदेव के बचपन में ही उनके पिताजी उन्हें छोडक़र चले गए, कुछ समय बाद उनकी बहन विधवा हो गई। इन सभी स्थितियों को देखकर छोटे से सुजानमल के दिमाग में अनेक प्रश्न आते थे कि लोग मर कैसे जाते हैं और वह अपनी मां से प्रश्न किया करते थे। मां के पास कोई उत्तर नहीं होता था। वह केवल रोती रहती थी। आचार्य मोतीलाल का चित्तौड़ में चातुर्मास हुआ, मां की प्रेरणा से सुजानमल प्रवचन में जाने लगे10 -11 वर्ष की उम्र थी गुरु का स्नेह मिला और संसार की नश्वरता को समझने का सौभाग्य मिला। गुरु के चरणों में दीक्षा लेने का विचार बताया छोटे से बालक ने लेकिन रिश्तेदारों और समाज के विरोध के कारण उनको वहां से अहमदाबाद उनके बड़े भाई के पास भेज दिया गया। अपने बड़े भाई के पास मात्र 14 दिन रहने के बाद बिना टिकट, बिना किसी को कुछ बताए ट्रेन में बैठकर हल्दीघाटी स्थित कडिय़ा नाम के गांव में पहुंच गए। जहां गुरुदेव अंबालाल विराजमान थे और वहां पर 5 या 6 श्रावकों की देखरेख में ही उनको एक वटवृक्ष के नीचे दीक्षा दे दी। उनकी माता नाथकंवर ने भी दीक्षा ली। उनकी बहन उगम कंवर ने भी दीक्षा ली। गुरुदेव ने 13 वर्ष की आयु में दीक्षित होकर जिनशासन को दीपाया। वह बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व थे।