Caste and religion after death now seeing people in India brvj – Opinion: क्या भारत में अब मरने के बाद लोग उनकी जाति और धर्म देखने लगे हैं? | – News in Hindi

पटना. देश में पिछले दिनों कई घटनाएं हुई, लखीमपुर से लेकर श्रीनगर तक. जिसने न सिर्फ राजनीतिक दलों को बल्कि आम जनों को भी उद्वेलित किया. लखीमपुर का जिक्र सबसे पहले इसलिए क्योंकि यहां, प्रियंका गांधी से लेकर, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी, काँग्रेस नेता नवजोत सिंह सिंह सिद्धू समेत कई विपक्षी दलों ने दौरा किया, किसानों परिवारों से मिलकर उनका दुख साझा किया. उन किसानों की मौत कैसे हुई, किन हालातों में ये अब जांच का विषय है, लेकिन इसके इर्द- गिर्द जिस तरह से राजनीतिक लामबंदी हो सकती थी, हुई. एक दूसरे पर जितने कीचड़ उछाले जा रहे हैं, उछाले गए. लखीमपुर में जिन चार किसानों की मौत हुई, साथ ही बीजेपी के जिन चार कार्यकर्ताओं की जानें गईं, उसको लेकर नेता निचले स्तर तक गिर गए. राजनीतिक दलों ने हर वो पैतरा आजमाया जिससे वो खुद को किसानों को सबसे बड़ा हितैषी बता सके.

जब विपक्षी दलों के लोग लखीमपुर में राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे थे, उसी समय कश्मीर में भी हत्याओं को अंजाम दिया जा रहा था. आतंकी चुन-चुन कर वैसे लोगों को निशाना बना रहे थे जो बहुसंख्यक मुस्लिम समाज से नहीं थे. वैसे लोग उनकी बंदूकों के निशाने पर आ रहे थे जो दवा बेचने का काम कर रहे थे, सड़क के किनारे पानी-पूरी बेचने का काम कर रहे थे. स्कूल में बच्चों के भविष्य को सँवारने का काम कर रहे थे. देखते ही देखते श्रीनगर के अंदर आधे दर्जन वैसे लोग मौत का घाट उतार दिये गए, जो सामान्य नागरिक थे, जो शान्तिप्रिय लोग थे.

इन दोनों घटनाओं का ज़िक्र और विश्लेषण इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इसके जरिये हम उस सोच को डिकोड कर सकते हैं जो हर बड़ी घटना के बाद अपने हिसाब से देश में बहस का विषयवस्तु तय करता है. एक ऐसा तंत्र जो हवा बनाता है कि किन विषयों पर बात करनी है किन विषयों पर बात नहीं करनी है. लखीमपुर पर जितनी बहस हो सकती थी, हुई लेकिन कश्मीर में मारे गए उन लोगों का कसूर था. क्या उनके परिवार नहीं थे.

क्या उनका समाज में कोई योगदान नहीं था?

ये कौन तय करता है कि किस मौत के बाद कौन सी खबर ट्रेंड होगी, किसका हेश टैग बनेगा. बहरहाल, ये एक अलग और काफी गंभीर विषय है. जिसको लेकर समय-समय पर सोशल मीडिया पर तेज बहस भी होती रहती है. आगे भी होती रहेगी.

आतंकी हमले में मारे गए लोग क्या देश के नागरिक नहीं?

पर यहाँ उससे भी चिंता का विषय है आतंकी हमले में मारे गए लोगों के प्रति समाज की संवेदनशून्यता का. उनलोगों के प्रति समाज की क्या कोई ज़िम्मेवारी बनती है? कश्मीर में आतंकियों के हाथों मारे गए एक गैर कश्मीरी थे रवींद्र पासवान. लेकिन उनकी हत्या के बाद उनके पार्थिव शरीर को श्रीनगर से पटना और आगे भागलपुर ले जाने का इंतजाम तक नहीं हो सका?

राजनीति की आड़ में असल खबर ही छिप गई!

खबर तो ये थी कि श्रीनगर से पटना तक जहाज़ पर शव भेजने का इंतजाम हुआ वहाँ के डीएम ने कर दिया लेकिन पटना से भागलपुर तक शव ले जाने जिम्मेवारी किसी ने नहीं ली. नतीजतन उसे अपने गंगा के किनारे की मिट्टी नसीब नहीं हो सकी. किसी बड़े नेता ने उसके परिवार का हाल नहीं पूछा क्योंकि वो मर चुका था. और मरे हुये लोगों के वोट की कोई कीमत नहीं होती है.

रवींद्र पासवान को नहीं नसीब हुई गंगा की मिट्टी

आप समझ सकते हैं कि बिहार और झारखंड के हजारों लोग जम्मू-कश्मीर में मजदूरी करने के लिया जाते हैं. बिहारी मजदूर तो आपको कारगिल में भी सड़क बनाते हुए नज़र आ जाएंगे. वो आपको कश्मीर के सुदूर हिस्सों में नारियल पानी बेचते नज़र आ जाएंगे. पिछले दिनों ही झारखंड से एक ट्रेन मजदूरों को लेकर गई है. उनकी सुरक्षा का क्या? उनके साथ अगर कुछ अनहोनी होती है तो क्या उम्मीद करें देश और समाज उसके लिए कुछ सोचेगा? या मरने के बाद उसका धर्म और जाति देखेगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

ब्लॉगर के बारे में

ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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